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کسی اچھی اور معیاری تحریر کا مطالعہ انسان سے انسانیت تک کا ایک مکمل سفر ہے، ذوقِ مطالعہ اور شوقِ تحریر انسانی فکرونظرکو معراج کی آخری سرحد تک پہنچانے کا مؤثر ترین ذریعہ ہے،آئیں مطالعے کے اس سفر میں قدم قدم ساتھ چلتے ہیں۔

راکھی بندھوانا کیسا ہے | محمد اویس العطاری المصباحی

Bahut se muslim bhai hindu behno se rakhi bandhwate hain to ye sahi hai ya galat hazrat batao? [8 / 8 / 2025]


بِسْمِ اللہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ
`اَلْجَوَابُ بِعَوْنِ الْمَلِکِ الْوَھَّابِ اَللّٰھُمَّ ھِدَایَۃَ الْحَقِّ وَالصَّوَابِ`

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Raksha Bandhan


      किसी मुसलमान का हिन्दू लड़की से राखी बधँवाना शरअ़न ना जाइज़ और गुनाह है, क्योंकि इस में गै़र मेहरम लड़की को बे पर्दा देखना और उस को छूना पाया जाता है जो कि हराम है,और राखी बांधना हिंदुओं का क़ौमी शिआर है। और क़ौमी शिआ़र को अपनाना ह़राम है।


        राखी बँधवाने के मुतअ़ल्लिक़ मुफ्ती शरीफुल ह़क़ अमजदी رَحْمَۃُاللہِ تَعَالٰی عَلَیْہِ* फरमाते है:“जिन मुसलमान औरतों ने हिंदुओं को ये डोरा बाँधा या जिन मुसलमान मर्दों ने हिन्दू औरतों से ये डोरा बधँवाया वो सब फासिक़ो फाजिर, गुनाहगार, मुस्तहिक़्क़े अ़जा़बे नार हुए। लेकिन काफिर न हुए इस लिए कि राखी बाँधना पूजा नहीं इन का क़ौमी त्यौहार है और उन का ये क़ौमी शिआ़र है, मज़हबी शिआ़र नहीं। (1)


         अजनबी मर्द का औरत को देखने के बारे में *हदीसे पाक में है: “لعن الله الناظر والمنظور إليه” *तर्जुमा:* रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमया: कि देखने वाले पर और उस पर जिस की तरफ नज़र की गई, अल्लाह तआ़ला लअ़नत फरमता है।(यानी देखने वाला जब बिला उज्र क़सदन देखे और दूसरा अपने को बिला उ़ज़्र क़सदन दिखाए)। (2)


       अजनबिया औरत को छूने के हराम होने के बारे में *हदीसे पाक* में है:“قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:لأن يطعن في رأس أحدكم بمخيط من حديد خير له من أن يمس امرأته، لا تحل له” *तर्जुमा:* रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फरमया:तुम में से किसी के सर में लोहे की सुई घोंप दी जाए, तो ये उस के लिए इस से बेहतर है कि वो ऐसी औरत को छूए, जो उस के लिए ह़लाल नहीं। (3)

       आला ह़ज़रत इमाम अह़मद रज़ा खा़न رَضِیَ اللہُ تَعَالٰی عَنْہُ* से सवाल हुआ कि “अक्सर औरतें मन्हार को बुला कर पर्दे में से हाथ निकाल कर मन्हार के हाथ में हाथ दे कर चूड़ियाँ पहनती हैं ये जाइज़ है या नहीं?” आप ने जवाबन इरशाद फरमाया:ह़राम ह़राम ह़राम है। (4)


     नोट:- हम पर उ़लमा की इताअ़त और उन का(जाइज़ कामों में) हु़क्म मानना लाज़िम है। लिहाज़ा जब वो कोई मसअला बतायें तो हमें चाहिए कि बिगै़र दलील के ऐक्सेप्ट करें।



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(1) `फतावा शारेह़ बुख़ारी`, जिल्द:2, पेज नंबर:565

(2)`शुअ़बुल ईमान`, जिल्द:10, पेज नंबर:214.

(3) `अल‌मुअ़जमुल कबीर`, जिल्द:20, पेज नंबर:211, हदीस:486.

(4) `‌फतावा रज़विय्या`, जिल्द:22, पेज नंबर:247.


از قلم: محمد اویس العطاری المصباحی


والله تعالى اعلم بالصواب

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